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गरियाबंद में मृत किसान को जिंदा बताकर बेची जमीन ? : पटवारी से रजिस्ट्री ऑफिस तक कटघरे में, पड़ोसी के आधार से खेल, जानिए कैसे पकड़ाया शातिर

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में जमीन हड़पने का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजस्व और रजिस्ट्री व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक मृत किसान की करीब ढाई एकड़ कृषि भूमि हड़पने के लिए पहले उसे अपनी पत्नी का पिता बताकर फौती (उत्तराधिकार) दर्ज कराने की कोशिश की गई। जब यह दांव नहीं चला तो पड़ोसी के आधार कार्ड में छेड़छाड़ कर जाली पहचान बनाई गई और उसी के सहारे जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई। मामला तब खुला, जब नामांतरण (म्यूटेशन) से पहले गांव में इश्तिहार पहुंचा। ग्राम पंचायत ने पूरे खेल पर सवाल उठा दिए। अब देवभोग उप पंजीयक कार्यालय ने मामले की जांच शुरू कर दी है। डिजिटल व्यवस्था के बावजूद जाली आधार से हो गई रजिस्ट्री सरकार ने जमीन की रजिस्ट्री प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए इसे पूरी तरह डिजिटल किया है, लेकिन बजाड़ी हल्का में जाली आधार कार्ड के सहारे पूरी रजिस्ट्री हो गई। आरोप है कि पहले जमीन के रिकॉर्ड में नाम और पता बदलवाया गया, फिर उसी आधार पर ढाई एकड़ कृषि भूमि की रजिस्ट्री करा दी गई। हालांकि, ग्राम सरपंच की सतर्कता के कारण नामांतरण की प्रक्रिया रुक गई और पूरा मामला उजागर हो गया। अब देवभोग उप पंजीयक कार्यालय में प्रभारी सहायक पंजीयक अजय चंद्रवंशी इस पूरे प्रकरण की जांच कर रहे हैं। 80 साल पुरानी जमीन का मालिक बना 39 साल का युवक पूरा मामला अमलीपदर तहसील के बजाड़ी गांव स्थित खसरा नंबर-12 की करीब ढाई एकड़ कृषि भूमि का है। राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक यह भूमि हरिसिंह के नाम दर्ज थी। 15 अप्रैल 2025 को तत्कालीन सहायक पंजीयक चितेश देवांगन की मौजूदगी में यह जमीन उरमाल निवासी शांतिलाल जैन को डेढ़ लाख रुपए में बेच दी गई। रजिस्ट्री के बाद जब नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई और गांव में सार्वजनिक इश्तिहार पहुंचा, तब ग्राम सरपंच यशोदा नेताम ने आपत्ति दर्ज करा दी। सरपंच प्रतिनिधि दुर्बल नेताम ने बताया कि जिस व्यक्ति को विक्रेता बताया गया, वह उस पते पर कभी नहीं रहा। गांव के किसी व्यक्ति ने उसे कभी देखा तक नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन करीब 80 वर्षों से गांव की जानकारी में थी और इसे ग्राम देवी की सेवा करने वाले तुकाराम कुम्हार के परिवार को दान में दिया गया था। ऐसे में अचानक 39 वर्षीय व्यक्ति के नाम से जमीन की बिक्री पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गई। पड़ोसी के आधार कार्ड में छेड़छाड़ कर बनाई नई पहचान ग्राउंड स्तर पर हुई पड़ताल में और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रजिस्ट्री दस्तावेज में भूमि स्वामी हरिसिंह नागेश पिता लक्ष्मण के नाम जिस आधार नंबर 943277522463 का उल्लेख किया गया, वह वास्तव में वार्ड क्रमांक-2 निवासी हरिराम नागेश पिता जयमल नागेश का निकला। रजिस्ट्री के दौरान अपलोड की गई तस्वीर की जांच में सामने आया कि जमीन बेचने वाला व्यक्ति हरिराम नहीं, बल्कि उसका पड़ोसी भंवरलाल नागेश पिता लखन नागेश था। जब भंवरलाल से इस संबंध में पूछताछ की गई तो उसने जमीन बेचने की बात स्वीकार कर ली। सफाई में उसने कहा कि उसका उर्फ नाम हरिसिंह है। आरोप है कि पिता के नाम की समानता का फायदा उठाकर उसने जाली आधार कार्ड तैयार कराया और उसी के आधार पर रजिस्ट्री करवा ली। रजिस्ट्री की रकम खरीदार से चेक के जरिए ली गई और ग्रामीण बैंक स्थित खाते से उसे भुना भी लिया गया। चार साल पहले शुरू हुई थी जमीन हड़पने की साजिश जांच में यह भी सामने आया कि इस जमीन को कब्जाने की तैयारी वर्ष 2018 से ही शुरू हो गई थी। जिस हरिसिंह नागेश को सरकार ने यह भूमि आवंटित की थी, वह देवभोग तहसील के कैठपदर गांव का निवासी था और मार्च 2018 में उसकी मृत्यु हो चुकी थी। आरोप है कि मृतक की जमीन पर नजर रखने वाले भंवरलाल और उसके साथियों ने सबसे पहले राजस्व रिकॉर्ड बदलवाने की योजना बनाई। पत्नी ने मृत किसान को अपना पिता बताकर कराई फौती की कोशिश मार्च 2022 में भंवरलाल ने अपनी पत्नी प्रभंजली के माध्यम से मैनपुर तहसील में फौती दर्ज कराने के लिए आवेदन कराया। आवेदन में मृतक हरिसिंह नागेश को अपना पिता बताया गया और बजाड़ी गांव के पते के आधार पर नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई। लेकिन फौती दर्ज करने से पहले जारी सार्वजनिक इश्तिहार के दौरान ग्रामीणों ने आपत्ति उठा दी, जिसके बाद यह प्रयास नाकाम हो गया। इसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर दूसरा रास्ता अपनाया और जाली आधार कार्ड के जरिए सीधे रजिस्ट्री करवा दी। रजिस्ट्री सिस्टम पर उठे बड़े सवाल सरकार इस पूरे मामले ने रजिस्ट्री व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब आधार कार्ड के जरिए पहचान सत्यापित की जाती है, तो जाली आधार के सहारे रजिस्ट्री कैसे हो गई? जमीन के मूल मालिक की पहचान और दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं हुआ? नाम और पता बदलने की प्रक्रिया में किस स्तर पर लापरवाही हुई? पटवारी से लेकर दस्तावेज तैयार करने वालों तक जांच प्रभारी उप पंजीयक अजय चंद्रवंशी ने बताया कि जिस समय यह रजिस्ट्री हुई, उस समय आधार की ई-केवाईसी (e-KYC) अनिवार्य नहीं थी। प्रस्तुतकर्ता और गवाह के आधार पर रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी हो जाती थी। उन्होंने कहा कि अब इस पूरे मामले की जांच की जा रही है। फौती दर्ज कराने की कोशिश, रिकॉर्ड में नाम बदलवाने, जाली आधार कार्ड तैयार कराने, रजिस्ट्री के लिए दस्तावेज तैयार करने और रिकॉर्ड की नकल उपलब्ध कराने वाले सभी लोग जांच के दायरे में हैं। प्रारंभिक जांच में पूरा मामला सुनियोजित कूट रचना और फर्जीवाड़े का प्रतीत हो रहा है। यदि आरोप सही पाए गए, तो इस मामले में कई लोगों पर आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।

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