SCO Summit 2025: साल 2001 में गठित इस संगठन को शुरुआत में मध्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव के चैलेंज देने के तौर पर देखा गया था. इस ग्रुप में अलग-अलग प्राथमिकताओं वाला देश शामिल है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य आठ देशों के राष्ट्राध्यक्ष शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में एक साथ मिलने वाले हैं. इस 10 सदस्यीय ग्रुप में एशिया के कई बड़े पावरफुल देश शामिल हैं. इसे एक ऐसे मंच के रूप में देखा जा रहा है जहां ये देश व्यापार, सुरक्षा और क्षेत्रीय विवादों पर अमेरिका के नेतृत्व वाले दृष्टिकोण से अलग विकल्प की तलाश कर रहे हैं.
एसीसीओ के 10 सदस्य
एससीओ की शुरुआत 2001 में हुई थी. तब इसमें चीन और रूस मुख्य किरदार निभाते थे और कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान भी इसके सदस्य थे. समय के साथ इसका विस्तार हुआ और 2017 में भारत और पाकिस्तान, 2023 में ईरान और 2024 में बेलारूस इसमें शामिल हो गए, जिससे इसकी कुल सदस्य संख्या 10 हो गई. ये देश मिलकर दुनिया की लगभग 40 फीसदी आबादी का नेतृत्व करते हैं.
अमेरिका के खिलाफ बना था गठबंधन
2001 में गठित इस संगठन को शुरुआत में मध्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव के चैलेंज देने के तौर पर देखा गया था. इस ग्रुप में अलग-अलग प्राथमिकताओं वाला देश शामिल है. इस ग्रुप के सादस्य ईरान और बेलारूस यूरोपीय देशों के प्रतिबंध का सामना कर रहे हैं. पाकिस्तान सैन्य और आर्थिक सहायता के लिए चीन पर बहुत अधिक निर्भर है. यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस को पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिका से अलगाव का सामना करना पड़ रहा है. इस सब के बीच भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसने अधिक स्वतंत्र रुख अपनाया हुआ है. एससीओ के साथ जुड़ते हुए भी भारत अमेरिका और क्वाड में अपने सहयोगियों के साथ संबंध बनाए हुए है.
भारत के लिए क्या हैं एसीसीओ समिट के मायने
एससीओ आमतौर पर सिक्योरिटी, काउंटर-टेररिज्म, ट्रेड और एनर्जी को ऑपरेशन पर फोकस करता है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूसी तेल का एक महत्वपूर्ण खरीदार बन गया है, जिससे अमेरिका साथ तनाव पैदा हो गया है. एससीओ का सदस्य होने के बाद भी कुछ ऐसे विषय हैं, जिस पर भारत खुलकर चीन और रूस के साथ खड़ा नहीं हो सकता है. यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों का या ताइवान और साउथ चाइना सी पर चीन के दावों का भारत खुलकर समर्थन करे इसकी संभावना कम ही है.