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उदंती–सीतानदी टाइगर रिज़र्व_जब रक्षक ही बन जाएँ “रॉयल तस्कर”

उदंती–सीतानदी टाइगर रिज़र्व… नाम सुनते ही दिमाग़ में जंगल की शांति, वन्यजीवों की सुरक्षा और कानून की सख़्ती की तस्वीर उभरती है। लेकिन ज़मीन पर जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी वन्य संरक्षण पर बनी डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि “सरकारी विशेषाधिकार तस्करी संस्करण” लगती है। यह वही संवेदनशील इलाका है जहाँ आम आदमी अगर शाम 6 बजे के बाद गलती से मोटरसाइकिल लेकर घुस जाए, तो कानून ऐसा टूट पड़ता है जैसे उसने लकड़ी नहीं, पूरा जंगल ही उठा लिया हो। यह वही इलाका है जहाँ एक सूखी लकड़ी उठाने पर भी अपराध की धारा ऐसे लगती है जैसे कोई अंतरराष्ट्रीय माफ़िया पकड़ा गया हो। लेकिन जनाब! कानून की यह तलवार सबके लिए बराबर नहीं है। यहाँ लकड़ी का परिवहन हो रहा है — _एसडीओ की सरकारी गाड़ी में _ बिना किसी वैध पर्ची के _ रात के प्रतिबंधित समय में _ और कथित तौर पर गाड़ी चालक स्वयं एसडीओ का बेटा अब सवाल उठता है — अगर यही “हिमाकत” कोई आम ग्रामीण करता, तो क्या होता? बाइक ज़ब्त, जुर्माना, एफआईआर, फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर “कार्यवाही” की वाहवाही। लेकिन यहाँ? यहाँ तो लकड़ी भी VIP है, गाड़ी भी VIP है और शायद कानून भी छुट्टी पर है। वन विभाग वही विभाग है, जहाँ लकड़ी तस्करी को “गंभीर अपराध” कहा जाता है। वही विभाग, जहाँ वन्यजीवों की सुरक्षा का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट तक ने रात 6 बजे के बाद आवाजाही पर रोक लगवाई है। और वही विभाग, जिसकी नाक के नीचे — नहीं, नाक के ऊपर — सरकारी गाड़ी में लकड़ी का परिवहन हो रहा है। अब इसे क्या कहें? तस्करी? या “सरकारी सेवा लाभ”? क्योंकि सामान्य भाषा में, संवेदनशील टाइगर रिज़र्व क्षेत्र से लकड़ी ले जाना अपराध है, चाहे लकड़ी छोटी हो या बड़ी। कानून लकड़ी की लंबाई नहीं, नीयत देखता है — या शायद नहीं देखता, अगर गाड़ी सरकारी हो। सबसे गंभीर सवाल यह नहीं कि लकड़ी क्यों ले जाई जा रही थी। सबसे गंभीर सवाल यह है कि अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो जंगल को बचाएगा कौन? वन्यजीव पहले ही सड़क, खनन और शोर से परेशान हैं। उनके विचरण के नाम पर आम जनता को रोका गया। लेकिन जब नियम तोड़ने की बारी आई, तो नियम खुद किनारे खड़े दिखे। अब सवाल उठता है: _ क्या इस लकड़ी परिवहन की वैधानिक अनुमति थी? _ क्या कोई पर्चा काटा गया? _अगर नहीं, तो यह सीधा अपराध नहीं तो क्या है? _ और अपराध में प्रयुक्त सरकारी जिप्सी का क्या होगा? _क्या उस पर भी वही कार्रवाई होगी जो किसी आम आदमी की बाइक पर होती? या फिर यहाँ भी एक नया नियम लागू है — “सरकारी अपराध, निजी दंड से मुक्त” नियमावली। उदंती–सीतानदी टाइगर रिज़र्व सिर्फ जंगल नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। अगर यहाँ भी कानून चयनात्मक हो गया, तो फिर संरक्षण सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रह जाएगा। आज सवाल लकड़ी का है। कल सवाल जंगल का होगा। और परसों शायद टाइगर ही पूछेगा — “हमारी सुरक्षा का ठेका आखिर किसके पास है?” गरियाबंद जिला से संभाग ब्यूरो राजेश जगत की खबर

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