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एक दिन, दो फंदे — सवालों के कांटे में उलझता गरियाबंद!”
जिले में विकास के दावों की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि एक ही दिन में दो जिंदगियां खामोश हो गईं… और पीछे छोड़ गईं ढेर सारे सवाल, जिनका जवाब शायद फाइलों में भी नहीं मिलेगा। एक तरफ 18 साल का धनीराम यादव — उम्र इतनी कि सपनों को पंख लगते हैं, लेकिन उसने फंदा चुन लिया। दूसरी तरफ 52 साल के रुद्र (लूदर) साहू — जिंदगी का लंबा अनुभव, लेकिन पेट दर्द से जूझते-जूझते आखिरकार जिंदगी से ही हार गए। कहानी यहीं खत्म नहीं होती… धनीराम ने जाने से पहले इंस्टाग्राम पर 108 एम्बुलेंस की फोटो डाल दी — जैसे सिस्टम को आखिरी सलाम कर रहा हो… या शायद एक खामोश ताना मार गया कि “जब जरूरत थी, तब कहाँ थे?” कांटों पर चढ़कर मौत तक पहुँचना… लूदर साहू की मौत सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक दर्दनाक प्रतीक बन गई है। जिस पेड़ पर उन्होंने फंदा लगाया… वह कोई साधारण पेड़ नहीं था — कांटों से भरा पेड़। जरा सोचिए— जिस इंसान को पेट दर्द ने जीने नहीं दिया…वो उसी हालत में उस कांटेदार पेड़ पर चढ़ा होगा। हर कदम पर कांटे चुभते होंगे…हर पकड़ पर दर्द और गहराता होगा…लेकिन शायद उस वक्त— शरीर के कांटों से ज्यादा, जिंदगी के कांटे चुभ रहे थे। और आखिरकार… उसी कांटों के बीच, रस्सी बांधकर उसने अपनी सांसों को विराम दे दिया। लूदर साहू के लिए पेट दर्द सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि मौत का कारण बन गया। सरकारी दावों में “मुफ्त इलाज” और “बेहतर स्वास्थ्य सुविधा” के पोस्टर चमकते रहे… और जमीनी हकीकत में एक आदमी दर्द से हारकर फंदे पर झूल गया। अब सवाल ये है— क्या पेट दर्द इतना बड़ा था… या व्यवस्था इतनी छोटी? धनीराम की बात करें तो वह रात 12 बजे “घूमकर आता हूं” कहकर निकला… और फिर कभी नहीं लौटा। गांव की पानी टंकी उसके आखिरी ठिकाने में बदल गई। उसका आखिरी इंस्टा स्टेटस अब भी पहेली बना हुआ है — क्या यह मदद की पुकार थी… या सिस्टम के लिए एक साइलेंट नोटिस? उधर पुलिस अपनी जांच में लगी है — “कारणों की तलाश जारी है…” लेकिन ये वही लाइन है जो हर ऐसे मामले में कॉपी-पेस्ट हो जाती है। व्यंग्य ये है कि— हमारे समाज में मौत के बाद कारण खोजने की परंपरा इतनी मजबूत है… कि जीते जी कारण समझने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक तरफ युवा मानसिक तनाव में झूल रहा है, दूसरी तरफ बुजुर्ग इलाज के अभाव में। और बीच में खड़ी है व्यवस्था… जो हर बार कहती है — “सब कंट्रोल में है।” गरियाबंद आज सिर्फ दो मौतों से नहीं… बल्कि उन अनदेखे सवालों से दंग है, जो हर घर, हर गांव, हर इंसान के मन में चुपचाप फंदा बनकर लटक रहे हैं। बस्तर की माटी न्यूज़ – सवाल पूछता रहेगा, जवाब चाहे जितना देर से आए






