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धान तस्करी का ‘पुष्पा मॉडल JCB से बनाई सड़क, नालों–नदियों को पार कर उड़ीसा का धान छत्तीसगढ़ में खपा रहे तस्कर सरकार की MSP खरीदी पर भारी धान माफिया : हल्दीघाटी में JCB से बनी अवैध सड़क, रोज 20 गाड़ियां पार जहां बाइक भी नहीं चलती थी, वहां पिकअप दौड़ रही धान तस्करों ने बना ली अपनी सड़क धान तस्करी का नया रूट उजागर : प्रशासन की नाक के नीचे JCB से बनी सड़क से रोज करोड़ों का खेल 15 कुंटल की उपज, 21 कुंटल की खरीदी फर्जी धान से मंडियों में सेंध
जैसे ही सरकार ने समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू की, वैसे ही धान तस्करों का नेटवर्क एक बार फिर पूरी तरह सक्रिय हो गया है। हर साल की तरह इस बार भी सरकारी व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को निशाना बनाते हुए उड़ीसा का धान छत्तीसगढ़ की मंडियों तक पहुंचाने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार तस्करों ने ऐसे-ऐसे नए रास्ते और तरीके अपनाए हैं, जिन्हें देखकर प्रशासन भी हैरान है। गरियाबंद जिला वैसे तो धान उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देवभोग और अमली पदर क्षेत्र में प्रति एकड़ औसतन उत्पादन करीब 15 कुंटल के आसपास ही रहता है, जबकि सरकार 21 कुंटल प्रति एकड़ तक धान खरीद रही है। इसी अंतर ने तस्करी के लिए सबसे बड़ा दरवाजा खोल दिया है। कई किसान अपनी वास्तविक उपज बेचने के बाद शेष बची मात्रा को पूरा करने के लिए उड़ीसा से धान मंगाकर अपने ही खाते में मंडी में खपा रहे हैं। इस पूरे खेल में मंडी के कुछ कर्मचारियों की भूमिका भी लगातार सवालों के घेरे में है, जिनकी कथित मिलीभगत के बिना यह खेल संभव नहीं माना जा रहा। सरकार ने इस बार उड़ीसा–छत्तीसगढ़ सीमा से जुड़े लगभग सभी प्रमुख रास्तों पर सख्त नाकाबंदी की है। जगह-जगह चेक पोस्ट बनाए गए हैं, कर्मचारी तैनात हैं और वाहनों की जांच की जा रही है। बावजूद इसके, तस्करों ने ऐसे वैकल्पिक रास्ते खोज निकाले हैं, जिनकी जानकारी न तो प्रशासन को थी और न ही अब तक किसी एजेंसी ने वहां निगरानी की थी। सबसे चौंकाने वाला मामला हल्दीघाटी क्षेत्र से सामने आया है। यहां एक ऐसा रास्ता, जो कभी इतना जर्जर था कि उस पर पैदल चलना भी मुश्किल था, आज चार पहिया वाहनों के लिए पूरी तरह तैयार कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि यह सड़क किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि खुद धान तस्करों ने JCB मशीन लगाकर तैयार की है। महज 5 से 7 दिनों में तस्करों ने जंगल, पहाड़ी और नालों के बीच से ऐसी सड़क बना दी, जिस पर अब पिकअप, ट्रैक्टर और अन्य चार पहिया वाहन आराम से निकल रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, दिन के समय उड़ीसा सीमा के डाबरी गांव के एक घर के सामने में धान को डंप किया जाता है जहां ग्राउंड रिपोर्टिंग करते समय लगभग 1000 पैकेट धाम डंपिंग था। शाम करीब 5 बजे के बाद तस्करी का असली खेल शुरू होता है। पूरी रात इसी अवैध सड़क के जरिए पिकअप और ट्रैक्टरों से धान छत्तीसगढ़ सीमा में दाखिल कराया जाता है। यह धान सीधे किसानों के घरों तक और कई मामलों में बिना किसी रोक-टोक के मंडियों तक पहुंचा दिया जाता है। यह पूरा नजारा किसी फिल्मी सीन से कम नहीं है। जिस तरह ‘पुष्पा’ फिल्म में चंदन की तस्करी जंगल, नदियों और नालों को पार कर होती है, ठीक उसी अंदाज में धान तस्कर भी लगभग 18 छोटी-बड़ी नालों और नदीनुमा रास्तों को पार कर उड़ीसा का धान छत्तीसगढ़ में पहुंचा रहे हैं। फर्क बस इतना है कि यहां चंदन नहीं, बल्कि सरकारी खजाने को चपत लगाने वाला धान है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि इस रास्ते की जानकारी अब तक प्रशासन को क्यों नहीं थी? जिस सड़क पर रोजाना 15 से 20 वाहन छत्तीसगढ़ सीमा में प्रवेश कर रहे हैं, वहां न तो कोई नाका है और न ही किसी तरह की निगरानी। यह रास्ता तस्करों के लिए मानो ‘किस्मत का गलियारा’ बन गया है। हालांकि प्रशासन की ओर से कार्रवाई भी हो रही है। अब तक 1255 कुंटल धान, 28 चार पहिया वाहन और 4 लावारिस वाहनों को जब्त कर पुलिस कार्रवाई कर चुकी है। लेकिन इसके बावजूद तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे लगातार नए-नए तरीके अपना रहे हैं। हाल ही में मोटरसाइकिल और साइकिल के जरिए धान ढोने के मामले भी सामने आए हैं, जिसने निगरानी तंत्र की चुनौती और बढ़ा दी है। भास्कर न्यूज़ की टीम ने जान जोखिम में डालकर इस पूरे नेटवर्क की पड़ताल करते हुए उस डंपिंग यार्ड तक पहुंच बनाई, जहां अब तक न प्रशासन पहुंच पाया था और न ही कोई अन्य न्यूज़ चैनल। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान साफ दिखा कि किस तरह संगठित तरीके से उड़ीसा का धान छत्तीसगढ़ में खपाया जा रहा है। अमलीपदर के तहसीलदार सुशील कुमार भोई ने भी माना है कि तस्कर लगातार रणनीति बदल रहे हैं और प्रशासन भी नई रणनीति के साथ उन पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है। बावजूद इसके, जिस तरह तस्करों ने प्रशासन की आंखों में धूल झोंकते हुए JCB से सड़क बना ली, वह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सवाल साफ है— जब सरकार खुद सड़क नहीं बना पाई, तो तस्करों ने कैसे बना ली? और अगर यह सब प्रशासन की नाक के नीचे हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी है? फिलहाल इतना तय है कि धान तस्करी का यह खेल सिर्फ कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि सरकारी खजाने को हजारों करोड़ के नुकसान की खुली साजिश है—जिस पर अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय करनी होगी।





