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उभलते नदी पार करते छात्र, अमलीपदर की हकीकत ने दिखाई सरकार को आईना

गरियाबंद ज़िले के अमलीपदर तहसील से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां ग्रामीण और स्कूली छात्र रोज़ाना जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करते हैं—क्योंकि पुल तो है नहीं, और योजनाओं का पुल कागज़ों में ही बह गया है। सुबह-सुबह किताबों का बोझ लिए बच्चे जब नदी की लहरों से जूझते हैं तो लगता है जैसे किसी रियलिटी शो का ‘एडवेंचर राउंड’ चल रहा हो। फर्क बस इतना है कि यहां कोई इनाम नहीं, बस डर और मजबूरी है। गाँववाले कहते हैं, “हर चुनाव में पुल का वादा मिलता है, पर चुनाव जीतने के बाद नेताजी के वादे पानी में ही बह जाते हैं।” सरकार की योजनाएँ तो हैं—“हर गांव तक सड़क”, “हर बच्चे तक शिक्षा”, “हर जगह पुल”—पर हकीकत ये कि बच्चे स्कूल जाने से पहले तैराकी सीखने को मजबूर हैं। पंचायत से लेकर जिले तक सबके पास फाइलें हैं, मगर किसी के पास पुल नहीं। ग्रामीणों का तंज़: “योजनाएं तो बड़ी-बड़ी हैं, पर हमारे बच्चे अब तक नाले-नदी पार करने की ओलंपिक प्रैक्टिस कर रहे हैं। अगला मेडल शायद यहीं से आए।” सोचने वाली बात यह है कि जिस देश में स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन की बातें हो रही हैं, वहां अमलीपदर के बच्चों को आज भी अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार करनी पड़ रही है। सरकार के लिए ये सिर्फ़ आंकड़े हैं, लेकिन इन बच्चों के लिए रोज़ का खतरा। अब सवाल ये है: पुल कब बनेगा? कागज़ की फाइलें कब पानी से बाहर आएंगी? या फिर सरकार अगले चुनाव तक बस यही कहेगी—“योजना जारी है, कार्य प्रगति पर है।” अमलीपदर की यह कहानी सिर्फ़ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है जहां घोषणाएं तेज़ बहती हैं, और विकास की नाव किनारे अटक जाती है

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