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धान तस्करों का खेल शुरू , सीमा पर प्रशासन की ढिलाई से बढ़ रहा राजस्व नुकसान की संका धान पर लगाम कब? प्रशासन की सुस्ती से हर साल खाली हो रहा सरकारी खजाना

छत्तीसगढ़–ओडिशा सीमा पर एक बार फिर धान तस्करों का खेल शुरू हो चुका है। सितंबर के आखिरी दिनों में ही तस्कर ओडिशा से बुर्जा बहाल, अमली पदर ,झाकर पारा, तेतेल खूंटी और खुट गांव बॉर्डर से होकर धान की खेप छत्तीसगढ़ की मंडियों तक पहुंचाने के लिए अपने-अपने तरीके में लग गए हैं।बुर्जा बहाल मार्ग से महज दो दिनों में 7–8 पिकअप गाड़ियां धान लेकर गोहैरा पदर पहुंच चुकी हैं, वहीं देवभोग इलाके के गोदामों में भी भारी मात्रा में अवैध स्टॉक भरा जा चुका है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, तस्कर दिनदहाड़े 407 पिकअप और ट्रैक्टर–ट्रॉलियों में धान ला रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि सीमा पर तैनात सुरक्षा गार्डों का कहना है—“धान पकड़ने का आदेश ऊपर से नहीं आया।” सवाल यह उठता है कि क्या अवैध परिवहन रोकने के लिए भी प्रशासन को विशेष निर्देश का इंतज़ार करना चाहिए? हर साल लाखों क्विंटल धान ओडिशा से छत्तीसगढ़ की मंडियों में पहुंचता है। मंडी संचालकों और तस्करों की मिलीभगत से यह धान स्थानीय किसानों के नाम पर बेचा जाता है। नतीजतन, सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। एक एकड़ की वास्तविक पैदावार से कहीं अधिक धान, किसानों के पट्टों में जोड़कर खपाया जाता है। स्थिति की गंभीरता के बावजूद प्रशासन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। सीमा पर नाकाबंदी और जांच की पहल अक्सर तभी होती है, जब मीडिया में मामला उछलता है—तब तक सैकड़ों गाड़ियां राज्य में घुस चुकी होती हैं। यही ढिलाई तस्करों को खुली छूट दे रही है। आवश्यक है कि सरकार तुरंत सख्त कार्रवाई के निर्देश जारी करे और सीमा पर चौकसी बढ़ाए। धान की तस्करी रोकने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित कर निरंतर निगरानी की जाए। मंडी संचालकों व तस्करों की मिलीभगत की निष्पक्ष जांच हो। यदि वर्तमान से ही शिकंजा कसा जाए, तो न केवल तस्करी पर लगाम लगेगी, बल्कि राज्य को हर साल होने वाले राजस्व नुकसान से भी बचाया जा सकेगा। धान तस्करी पर अंकुश लगाने में प्रशासन की सुस्ती अब गंभीर सवाल खड़े कर रही है—क्या सरकार वाकई अपने राजस्व और किसानों के हितों को बचाने के लिए तैयार है, या फिर तस्करों के सामने तंत्र की कमजोरी उजागर होती रहेगी?

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